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दिशाहीनता की शिकार केन्द्र सरकार
केन्द्र की भाजपा सरकार के सात माह के कार्यकाल में देश के समझदार लोग उलझ गये होंगे
पर उपदेश कुशल बहुतेरे
जो लोग आजकल दूसरों को चार से लेकर दस बच्चे पैदा करने का आदेश दे रहे हैं, वे अभी तक एक भी बच्चा नहीं पैदा कर सके और भविष्य में भी उनसे एक भी बच्चा मिलने की आशा नहीं। ये लोग बच्चे उत्पन्न करने से लेकर उनका पालन—पोषण करने के दायित्वों से दूर रहे हैं और इसी तरह के पारिवारिक दायित्वों का निवर्हन करने में विफल रहने के कारण वे परिवार नामक अति महत्वपूर्ण संस्था से पलायन कर गये हैं। हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी पत्नि को एक भी बच्चा प्रदान नहीं कर सके। उसी सरकार के भगवा ब्रिगेड वाले आज किस मुंह से दूसरे लोगों को दस—दस बच्चे पैदा करने का आदेश दे रहे हैं।
एक ओर ऐसे लोग कहते हैं कि ’यत्र नार्युस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता’, वहीं कहते हैं कि दस—दस बच्चे पैदा करो। जिस नारी की पूजा को देवता भी लालायित रहते हों, उसे आज के कई भारतीय संत बच्चे उत्पन्न कराने को प्रोत्साहित कर क्या संदेश देना चाहते हैं? क्या हमारी मां—बहने केवल बच्चे उत्पन्न करने के लिए हैं। यह भगवा ब्रिगेड भारतीय विशेषकर हमारे समाज की महिलाओं का अपमान करना चाहती है। जिसके सहारे उनका निजि स्वार्थ सिद्ध हो सके।
वैसे भी पूरा देश भारी आबादी का भार झेल रहा है। सड़क, स्कूल, रेलवे स्टेशन, बस अड्डे, अस्पताल भीड़ से भरे हैं। यह सबकुछ बढ़ती आबादी के कारण है। गंदगी बढ़ने का सबसे बड़ा कारण बढ़ती अविराम आबादी ही है। बल्कि एक वाक्य में कहा जाये तो बढ़ती आबादी को रोकना देश की सारी समस्याओं पर काबू पाने का एकमात्र साधन है। अधिक बच्चे पैदा करने का प्रोत्साहन देने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। संभव हो सके तो ऐसे लोगों को कोई भी दायित्वपूर्ण पद लेने से वंचित किया जाना चाहिए।
-इंडिया वाइन भारत.
चौंकाने वाले परिणाम आयेंगे दिल्ली चुनाव में
इस बार दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणाम चौंकाने वाले होंगे। हालांकि कई खबरिया चैनल भाजपा और आप में सीधी टक्कर मानते हुए पिछले चुनावों की तरह भाजपा को आप से थोड़ा मजबूत मानने की संभावना जता रहे हैं। वे यह सब ताजा सर्वेक्षणों के आधार पर मान रहे हैं। वैसे इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि असली टक्कर भाजपा और आप में है।
हम दिल्ली के दिल की बात कुछ ताजा हालात और बनते—बिगड़ते राजनैतिक समीकरणों को आधार बनाकर तह तक पहुंचने का प्रयास करते हैं। हाल ही में नरेन्द्र मोदी ने दिल्ली में रामलीला मैदान में एक रैली को संबोधित किया था। इस रैली के जरिये भाजपा यह देखना चाहती थी कि भीड़ कितनी जुड़ती है? इसी से यह पता लग जायेगा कि दिल्ली वालों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रति कितना रुझान है? भीड़ जुटाने के लिए पार्टी ने दिल्ली तथा उससे सटे राज्यों हरियाणा, उत्तर प्रदेश, और राजस्थान के सभी सांसदों को अपने—अपने इलाकों से भीड़ लाने को कहा था। इसके बावजूद मोदी को सुनने के लिए आशा से बहुत कम लोग इकट्ठा हुए। दिल्ली की इस रैली में दिल्ली के भी कम ही लोग आये। इसी से भाजपा नेताओं ने अनुमान लगा लिया कि दिल्ली में मोदी लहर नहीं है। अतः अकेले मोदी के दम पर सफल होना संदेह के घेरे में है। हालांकि मोदी ने इस रैली में बोलते हुए केवल अरविन्द केजरीवाल को ही निशाने पर लिया जबकि पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा का प्रमुख निशाना कांग्रेस थी। इससे यह भी पता चलता है कि भाजपा आज कांग्रेस के बजाय केजरीवाल से भयभीत है।
पहले शाजिया इल्मी और अब पूर्व आइपीएस अधिकारी किरण बेदी को भाजपा में शामिल करना भी आम आदमी पार्टी की ताकत को कमजोर करने का प्रयास है। यह सभी जानते हैं कि ये दोनों महिलायें भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम के दौरान अरविन्द केजरीवाल के साथ रही हैं तथा शाजिया ने आप के टिकट पर विधानसभा का चुनाव भी लड़ा था। किरण बेदी का भाजपा में आना शाजिया से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। दिल्ली में किरण एक बेहद ईमानदार तथा कुशल पुलिस प्रशासक रही हैं। यदि भाजपा उन्हें मुख्यमंत्री के चेहरे के रुप में मैदान में ले आयी तो केजरीवाल को बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ेगा। वैसे भाजपा केजरीवाल के सामने चुनावी मैदान में उन्हें लायेगी। यह लोहे से लोहा काटने वाली बात रहेगी। भाजपा रैली के बाद समझ गयी कि यहां मोदी फैक्टर के बजाय बेदी दांव चलाया जाये। इसमें कोई दो राय नहीं कि बेदी भाजपा को लाभ दिला सकती हैं।
दूसरी ओर महाराष्ट्र में भाजपा की सहयोगी शिवसेना ने दिल्ली चुनाव में भाग लेने की घोषणा कर दी है। पार्टी प्रमुख उद्धव ठाकरे के मुताबिक वे अपने उम्मीदवार मैदान में उतारेंगे। यदि ऐसा होता है तो निश्चित तौर पर भाजपा को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। इससे यहां सेना को भले ही कोई सफलता न मिले लेकिन भाजपा को भारी झटका लगेगा। यह भी हो सकता है, सेना का यह फैसला भाजपा को सत्ता से वंचित कर दे। इसका सबसे बड़ा लाभ आम आदमी पार्टी को मिलेगा।
उधर मायावती बसपा उम्मीदवारों को अधिकांश सीटों पर उतारना चाहती हैं। ये ऐसे मतदाता होंगे जो भाजपा और आप का समर्थन कर चुके हैं। इससे इन दोनों दलों का नुकसान होगा। इसका सीधा लाभ कांग्रेस को मिलेगा। इससे यह भी हो सकता है कि कांग्रेस पिछले चुनाव से कुछ अधिक सीटें जीत ले और भाजपा व आप पहले प्रदर्शन से नीचे आ जायें। यदि ऐसा हो गया तो सरकार बनने में और भी जटिल हालात उत्पन्न हो जायेंगे।
शिवसेना के मैदान में कूदने से परिणामों में भारी फेरबदल होने की संभावना है। महाराष्ट्र में भाजपा ने सरकार बनाते समय सेना को जिस तरह नचाया था, उसका बदला वह दिल्ली में लेना चाहती है।
दूसरी ओर अकाली दल को दरकिनार कर भाजपा पंजाब में बादल का विरोध कर रही है। उससे दिल्ली का सिख समुदाय और पंजाबी बिरादरी भाजपा का मुखर विरोध कर रहे हैं। दिल्ली में पंजाबी मतों की संख्या बहुत है जो कई सीटों के परिणाम बदल सकती है। इनमें से कुछ आप तथा कुछ कांग्रेस की तरफ जायेंगे। भाजपा को इससे बड़ा झटका लग सकता है। इस प्रकार से आये बदलाव का लाभ आप के साथ ही कांग्रेस को भी मिलेगा। यदि ऐसा हुआ तो भाजपा और आप की सीटें आसपास रहेंगी तथा कांग्रेस थोड़ा ऊपर हो सकती है। यदि आप व भाजपा 25 के आसपास लटक जायें और कांग्रेस 15 तक पहुंच जाये तो आश्चर्य की बात नहीं। यह सरकार बनने में और भी अड़चन पैदा कर सकता है। इन तीनों दलों में कोई भी किसी को समर्थन देना नहीं चाहेगा। यह स्थिति किसी भी तरह सुखद नहीं होगी।
-इंडिया वाइन राजनीति.
हम दिल्ली के दिल की बात कुछ ताजा हालात और बनते—बिगड़ते राजनैतिक समीकरणों को आधार बनाकर तह तक पहुंचने का प्रयास करते हैं। हाल ही में नरेन्द्र मोदी ने दिल्ली में रामलीला मैदान में एक रैली को संबोधित किया था। इस रैली के जरिये भाजपा यह देखना चाहती थी कि भीड़ कितनी जुड़ती है? इसी से यह पता लग जायेगा कि दिल्ली वालों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रति कितना रुझान है? भीड़ जुटाने के लिए पार्टी ने दिल्ली तथा उससे सटे राज्यों हरियाणा, उत्तर प्रदेश, और राजस्थान के सभी सांसदों को अपने—अपने इलाकों से भीड़ लाने को कहा था। इसके बावजूद मोदी को सुनने के लिए आशा से बहुत कम लोग इकट्ठा हुए। दिल्ली की इस रैली में दिल्ली के भी कम ही लोग आये। इसी से भाजपा नेताओं ने अनुमान लगा लिया कि दिल्ली में मोदी लहर नहीं है। अतः अकेले मोदी के दम पर सफल होना संदेह के घेरे में है। हालांकि मोदी ने इस रैली में बोलते हुए केवल अरविन्द केजरीवाल को ही निशाने पर लिया जबकि पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा का प्रमुख निशाना कांग्रेस थी। इससे यह भी पता चलता है कि भाजपा आज कांग्रेस के बजाय केजरीवाल से भयभीत है।
पहले शाजिया इल्मी और अब पूर्व आइपीएस अधिकारी किरण बेदी को भाजपा में शामिल करना भी आम आदमी पार्टी की ताकत को कमजोर करने का प्रयास है। यह सभी जानते हैं कि ये दोनों महिलायें भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम के दौरान अरविन्द केजरीवाल के साथ रही हैं तथा शाजिया ने आप के टिकट पर विधानसभा का चुनाव भी लड़ा था। किरण बेदी का भाजपा में आना शाजिया से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। दिल्ली में किरण एक बेहद ईमानदार तथा कुशल पुलिस प्रशासक रही हैं। यदि भाजपा उन्हें मुख्यमंत्री के चेहरे के रुप में मैदान में ले आयी तो केजरीवाल को बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ेगा। वैसे भाजपा केजरीवाल के सामने चुनावी मैदान में उन्हें लायेगी। यह लोहे से लोहा काटने वाली बात रहेगी। भाजपा रैली के बाद समझ गयी कि यहां मोदी फैक्टर के बजाय बेदी दांव चलाया जाये। इसमें कोई दो राय नहीं कि बेदी भाजपा को लाभ दिला सकती हैं।
दूसरी ओर महाराष्ट्र में भाजपा की सहयोगी शिवसेना ने दिल्ली चुनाव में भाग लेने की घोषणा कर दी है। पार्टी प्रमुख उद्धव ठाकरे के मुताबिक वे अपने उम्मीदवार मैदान में उतारेंगे। यदि ऐसा होता है तो निश्चित तौर पर भाजपा को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। इससे यहां सेना को भले ही कोई सफलता न मिले लेकिन भाजपा को भारी झटका लगेगा। यह भी हो सकता है, सेना का यह फैसला भाजपा को सत्ता से वंचित कर दे। इसका सबसे बड़ा लाभ आम आदमी पार्टी को मिलेगा।
उधर मायावती बसपा उम्मीदवारों को अधिकांश सीटों पर उतारना चाहती हैं। ये ऐसे मतदाता होंगे जो भाजपा और आप का समर्थन कर चुके हैं। इससे इन दोनों दलों का नुकसान होगा। इसका सीधा लाभ कांग्रेस को मिलेगा। इससे यह भी हो सकता है कि कांग्रेस पिछले चुनाव से कुछ अधिक सीटें जीत ले और भाजपा व आप पहले प्रदर्शन से नीचे आ जायें। यदि ऐसा हो गया तो सरकार बनने में और भी जटिल हालात उत्पन्न हो जायेंगे।
शिवसेना के मैदान में कूदने से परिणामों में भारी फेरबदल होने की संभावना है। महाराष्ट्र में भाजपा ने सरकार बनाते समय सेना को जिस तरह नचाया था, उसका बदला वह दिल्ली में लेना चाहती है।
दूसरी ओर अकाली दल को दरकिनार कर भाजपा पंजाब में बादल का विरोध कर रही है। उससे दिल्ली का सिख समुदाय और पंजाबी बिरादरी भाजपा का मुखर विरोध कर रहे हैं। दिल्ली में पंजाबी मतों की संख्या बहुत है जो कई सीटों के परिणाम बदल सकती है। इनमें से कुछ आप तथा कुछ कांग्रेस की तरफ जायेंगे। भाजपा को इससे बड़ा झटका लग सकता है। इस प्रकार से आये बदलाव का लाभ आप के साथ ही कांग्रेस को भी मिलेगा। यदि ऐसा हुआ तो भाजपा और आप की सीटें आसपास रहेंगी तथा कांग्रेस थोड़ा ऊपर हो सकती है। यदि आप व भाजपा 25 के आसपास लटक जायें और कांग्रेस 15 तक पहुंच जाये तो आश्चर्य की बात नहीं। यह सरकार बनने में और भी अड़चन पैदा कर सकता है। इन तीनों दलों में कोई भी किसी को समर्थन देना नहीं चाहेगा। यह स्थिति किसी भी तरह सुखद नहीं होगी।
-इंडिया वाइन राजनीति.
भाजपा दफ्तर के सामने क्यों किया पार्टी समर्थकों ने प्रदर्शन?
दिल्ली विधानसभा के चुनाव में अभी ज्यादा समय नहीं है। भाजपा कार्यकर्ताओं में खलबली मची हुई है। मंगलवार को जिस तरह सतीश उपाध्याय के समर्थकों ने प्रदर्शन किया उससे साफ जाहिर हो गया कि दिल्ली में भाजपा एकजुट नहीं। सतीश प्रदेश उपाध्यक्ष हैं।
भाजपा के दफ्तर के सामने हुआ यह प्रदर्शन बहुत मायने रखता है। कार्यकर्ता सतीश उपाध्याय को विधानसभा का टिकट न देने से नाराज हैं। उम्मीदवारों की लिस्ट में उनका नाम नहीं है।
क्या कहना है उपाध्याय का? :
सतीश उपाध्याय का कहना है कि पार्टी के लिये वे हमेशा एक कार्यकर्ता की तरह रहेंगे। जो जिम्मेदारी उन्हें सौंपी गयी है, उसे वे निभा रहे हैं।
अमित शाह के खिलाफ भी हुई नारेबाजी :
भाजपा के कार्यकर्ताओं का गुस्सा अमित शाह पर भी निकला। यह जायज भी था। शाह भाजपा में अहम जिम्मेदारी में हैं। बड़े फैसले उनकी मर्जी के बिना नहीं लिये जाते। खासकर दिल्ली जैसे प्रदेश में इस बार भाजपा की साख दांव पर है।
-इंडिया वाइन राजनीति.
आगे भी 'घर वापसी ' कराते रहेंगे राजेश्वर सिंह?
राजेश्वर सिंह को भले ही धर्म जागरण मंच से मुक्ति दिला दी गयी हो लेकिन उनके बयान जारी हैं।
राजेश्वर सिंह ने एक अखबार को बताया है कि उनके धर्मांतरण के कार्यक्रम भविष्य में भी जारी रहेंगे। हालंकि उन्होंने इसे घर वापसी का नाम दिया है। वे ऐसे भूले भटकों को मार्ग पर लाते रहेंगे जो धर्म से दूर चले गये थे।
खबरों की मानें तो राजेश्वर सिंह से खफा हिन्दू नेता शायद दूरी बनाने की सोच रहा हैं। उन्हें मीडिया में आयी कथित धर्मांतरण की खबरों की भी चिंता है। इससे शायद धर्म जागरण मंच पर असर हो सकता है।
लेकिन राजेश्वर सिंह ने कहा है कि उन्हें स्वास्थ्य से संबंधित समस्या थी जिसके चलते वे अब आराम चाहते हैं। कारण जो भी बतायें मगर राजेश्वर सिंह को जानबूझकर जागरण मंच से दूर किया गया है।
-इंडिया वाइन भारत.
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